परीक्षा विशेष: राजस्थानी भाषा एवं साहित्य – उद्भव, बोलियाँ और साहित्यिक शैलियाँ (RPSC/RAS केंद्रित संपूर्ण नोट्स)

राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान का आधार उसकी गौरवशाली राजस्थानी भाषा है। यह न केवल अभिव्यक्ति का माध्यम है, बल्कि यहाँ के इतिहास, शौर्य और प्रेम की कहानियों का जीवंत दस्तावेज है। प्रतियोगी परीक्षाओं में इस विषय से निश्चित रूप से प्रश्न पूछे जाते हैं।

परीक्षा विशेष: राजस्थानी भाषा एवं साहित्य – उद्भव, बोलियाँ और साहित्यिक शैलियाँ (RPSC/RAS केंद्रित संपूर्ण नोट्स)

यह लेख आपको राजस्थानी भाषा के उद्भव, वर्गीकरण, प्रमुख बोलियों के क्षेत्र और साहित्यिक शैलियों पर परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण और सटीक जानकारी प्रदान करता है।


1. राजस्थानी भाषा का उद्भव एवं विकास (Origin & Evolution)

राजस्थानी भाषा की उत्पत्ति को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं, लेकिन परीक्षा के लिए निम्नलिखित तीन मत और तथ्य सबसे महत्वपूर्ण हैं:

तथ्य/बिंदुविवरण और परीक्षा उपयोगी जानकारी
सर्वप्रथम उल्लेखउद्योतन सूरि द्वारा रचित ‘कुवलयमाला’ (778 ई.) ग्रंथ में ‘मरु भाषा’ के रूप में।
उत्पत्ति का सर्वमान्य मतगुर्जरी अपभ्रंश से। (समर्थक: डॉ. मोतीलाल मेनारिया, के. एम. मुंशी, आदि)
जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन का मतराजस्थानी की उत्पत्ति नागर अपभ्रंश से मानते हैं।
राजस्थानी नाम का प्रयोगसर्वप्रथम 1912 ई. में जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने अपनी पुस्तक ‘लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया’ में किया।
स्वर्ण काल (Golden Period)1650 ई. से 1850 ई. तक।
मूल लिपिमुड़िया/महाजनी/बणियावाटी लिपि। वर्तमान में देवनागरी लिपि का प्रयोग।
संवैधानिक स्थितिराजस्थानी मातृभाषा है, अभी तक संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल नहीं है।

2. राजस्थानी बोलियों का वर्गीकरण एवं प्रमुख क्षेत्र

राजस्थानी भाषा की 73 बोलियाँ/उप-बोलियाँ मानी जाती हैं। जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने बोलियों को पाँच मुख्य भागों में वर्गीकृत किया है:

A. पश्चिमी राजस्थानी (मारवाड़ी और उप-बोलियाँ)

यह सबसे महत्वपूर्ण और मानक बोली है। इसका साहित्यिक रूप डिंगल कहलाता है।

बोली का नामप्रमुख क्षेत्रसाहित्यिक महत्त्व
मारवाड़ी (मुख्य)जोधपुर, जैसलमेर, बीकानेर, नागौर, पाली, सिरोही।सर्वाधिक क्षेत्र में बोली जाने वाली; अधिकांश जैन साहित्य और मीराबाई की कुछ रचनाएँ।
मेवाड़ीउदयपुर, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, राजसमंद (मेवाड़ क्षेत्र)।महाराणा कुम्भा के नाटक इसी बोली में थे।
शेखावाटीसीकर, चूरू, झुंझुनूं (शेखावाटी क्षेत्र)।मारवाड़ी का प्रभाव।
गोडवाड़ीपाली के बाली, देसूरी और जालौर का अहोर क्षेत्र।मारवाड़ी की उप-बोली।
थलीबीकानेर और चूरू का कुछ भाग।

B. पूर्वी राजस्थानी (ढूंढाड़ी और उप-बोलियाँ)

इसकी मुख्य बोली ढूंढाड़ी है, जिसका साहित्यिक रूप पिंगल कहलाता है।

बोली का नामप्रमुख क्षेत्रसाहित्यिक महत्त्व
ढूंढाड़ी (मुख्य)जयपुर, दौसा, टोंक, किशनगढ़, अजमेर का पूर्वी भाग।संत दादू दयाल और उनके शिष्यों की वाणियाँ।
हाड़ौतीकोटा, बूँदी, बारां, झालावाड़ (हाड़ौती क्षेत्र)।राजस्थान में सबसे कम बोली जाने वाली बोली। सूर्यमल मिश्रण की रचनाएँ।
तोरावाटीजयपुर का उत्तरी भाग (सीकर, झुंझुनूं सीमा)।ढूंढाड़ी की उप-बोली।
नागरचोलटोंक का दक्षिणी-पूर्वी भाग।
राजावाटीजयपुर का पूर्वी भाग।

C. उत्तरी-पूर्वी राजस्थानी

बोली का नामप्रमुख क्षेत्रसाहित्यिक महत्त्व
मेवातीअलवर, भरतपुर (मेवात क्षेत्र)।संत लालदास और संत चरणदास की साहित्यिक रचनाएँ।
अहीरवाटीअलवर का बहरोड़ व मुंडावर, जयपुर का कोटपुतली क्षेत्र।मेवाती की उप-बोली, बांगरू (हरियाणवी) का प्रभाव।

D. दक्षिणी-पूर्वी राजस्थानी

बोली का नामप्रमुख क्षेत्रविशेषता
मालवीझालावाड़, कोटा, प्रतापगढ़ (मालवा क्षेत्र से प्रभावित)।मारवाड़ी और ढूंढाड़ी का मिश्रण। कानों को प्रिय लगने वाली बोली।
राँगड़ीमालवी और मारवाड़ी का मिश्रण।राजपूतों में अधिक प्रचलित, थोड़ी कर्कश बोली।
निमाड़ीदक्षिणी राजस्थान (मालवी की उप-बोली)।इसे दक्षिणी राजस्थानी भी कहते हैं।

E. दक्षिणी राजस्थानी

बोली का नामप्रमुख क्षेत्रविशेषता
वागड़ी/भीलीडूंगरपुर, बाँसवाड़ा (वागड़ क्षेत्र)।इस पर गुजराती भाषा का सर्वाधिक प्रभाव है।
खेराड़ीभीलवाड़ा, टोंक और बूँदी का कुछ भाग (मेवाड़ी और ढूंढाड़ी का मिश्रण)।

3. साहित्यिक शैलियाँ: डिंगल और पिंगल

राजस्थानी साहित्य को मुख्यतः दो शैलियों में रचा गया है:

शैलीडिंगल (डिंगळ)पिंगल (पिङ्गळ)
अर्थ/स्रोतपश्चिमी राजस्थानी की साहित्यिक शैली।पूर्वी राजस्थानी की साहित्यिक शैली।
क्षेत्रमारवाड़ (पश्चिमी राजस्थान)।ढूंढाड़ और हाड़ौती (पूर्वी राजस्थान)।
साहित्यकारचारण कवि।भाट कवि।
प्रमुख रसवीर रस की प्रधानता।श्रृंगार एवं कोमल रस की प्रधानता।
उत्पत्तिगुर्जरी अपभ्रंश से।शौरसेनी अपभ्रंश से।

4. राजस्थानी के प्रमुख साहित्यकार एवं रचनाएँ (Must-Learn for Exam)

इन साहित्यकारों और उनकी कृतियों से अक्सर ‘सुमेलन’ (Match the following) या ‘रचयिता’ (Author) से संबंधित प्रश्न पूछे जाते हैं।

साहित्यकार का नामप्रमुख रचनाएँ (परीक्षा की दृष्टि से)
पृथ्वीराज राठौड़वेली क्रिसन रुकमणी री (उत्तरी मारवाड़ी में), जिसे दुरसा आढ़ा ने ‘पाँचवाँ वेद’ और ’19वाँ पुराण’ कहा। डिंगल का हेरोस।
माधोदास दधवाड़ियाराम रासो (महत्वपूर्ण)।
सूर्यमल मिश्रणवंश भास्कर (अधूरा), वीर सतसई, बलवंत विलास (बूंदी के दरबारी कवि)।
कन्हैयालाल सेठियापाथल और पीथल, धरती धोरा री, लीलतांस (आधुनिक राजस्थानी साहित्य)।
बांकीदास आशियाबांकीदास री ख्यात, आयौ इंगरेज मुलक रै ऊपर (राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत गीत)।
नैणसीनैणसी री ख्यात (राजस्थान का गजेटियर), मारवाड़ रा परगना री विगत (जोधपुर के दीवान)।
दलपत विजयखुमान रासो (पिंगल भाषा)।
नरपति नाल्हबीसलदेव रासो (श्रृंगार रस, अजमेर के विग्रहराज चतुर्थ की कथा)।

📝 अन्य महत्वपूर्ण तथ्य (One-Liners)

  1. राजस्थानी व्याकरण की रचना सर्वप्रथम हेमचन्द्र सूरि द्वारा की गई।
  2. माधोदास दधवाड़िया ने ‘राम रासो’ की रचना की।
  3. संत दादू दयाल की रचनाएँ मुख्य रूप से ढूंढाड़ी बोली में हैं।
  4. डिंगल का हेरोस पृथ्वीराज राठौड़ को कहा जाता है।

याद रखें: राजस्थानी भाषा एक समृद्ध विषय है। ऊपर दिए गए तथ्य सीधे तौर पर RPSC और RAS जैसी परीक्षाओं में पूछे जाते हैं। इन बिन्दुओं पर गहन तैयारी आपको सफलता दिलाने में सहायक सिद्ध होगी।

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